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बीकानेर के इस अनोखे मंदिर में होती है, सभी मनो-कामनाएं पूरी !

बीकानेर के इस अनोखे मंदिर में होती सभी मनोकामनाएं पूरी

 

बीकानेर के कोडमदेसर भैरू – इतिहास एवम परिचय 

बीकानेर शहर से लगभग 24 किमी की दुरी पर स्थित है कोडमदेसर भैरू का भव्य मंदिर । राव बीका जी (1472-1504 ईस्वी के बीच बीकानेर के संस्थापक और शासक) ने कोडमदेसर भैरू मंदिर का निर्माण करवाया था, राव बीका जी का जन्म जोधपुर के शाही परिवार में हुआ था । उन्होंने बीकानेर राज्य की स्थापना के लिए 1465 ईस्वी में जोधपुर को छोड़ दिया । यह मंदिर पूरी तरह से खुला है । यह मंदिर सफेद संगमरमर द्वारा बना है ।

 ऐतिहासिक है  ये मंदिर 

भैरुजी के मंदिर के पास ही एक पवित्र तालाब, कोडमदेसर स्‍तंभ और रियासत कालिन किला है । मंदिर के पास ही दो सतीमाता की देवलि और प्राचीन शिलालेख भी है । यहाँ प्रति वर्ष मेला का आयोजन भी होता है. मंदिर में पुरे साल भव्य पूजा, जागरण और महाप्रसादी, अभिषेक अनुष्ठान, श्रंगार आदि के कार्यक्रमों का आयोजन होता ही रहता है ।

 कृष्णपक्ष की अष्टमी को भगवान भैरव हुए थे  प्रकट 

शिवपुराण के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को भगवान भैरव प्रकट हुए थे, जिसे श्रीकाल भैरवाष्टमी के रूप में जाना जाता है। रूद्राष्टाध्यायी तथा भैरव तंत्र के अनुसार भैरव को शिवजी का अंशावतार माना गया है। भैरव का रंग श्याम है। उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें वे त्रिशूल, खड़ग, खप्पर तथा नरमुंड धारण किए हुए हैं। इनका वाहन श्वान (कुत्ता) है। इनकी वेश-भूषा लगभग शिवजी के समान है।  भैरव श्मशानवासी हैं। ये भूत-प्रेत, योगिनियों के अधिपति हैं। भक्तों पर स्नेहवान और दुष्टों का संहार करने में सदैव तत्पर रहते हैं। भगवान भैरव अपने भक्तों के कष्टों को दूर कर बल, बुद्धि, तेज, यश, धन तथा मुक्ति प्रदान करते हैं। जो व्यक्ति भैरव जयंती को अथवा किसी भी मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भैरव का व्रत रखता है, पूजन या उनकी उपासना करता है वह समस्त कष्टों से मुक्त हो जाता है।

रविवार एवं मंगलवार को भैरव की उपासना का दिन
रविवार एवं मंगलवार को भैरव की उपासना का दिन

रविवार एवं मंगलवार को भैरव की उपासना का दिन

रविवार एवं मंगलवार को भैरव की उपासना का दिन माना गया है। कुत्ते को इस दिन मिष्ठान खिलाकर दूध पिलाना चाहिए। भैरव की पूजा में श्री बटुक भैरव अष्टोत्तर शत-नामावली का पाठ करें। इनकी प्रसन्नता के लिए श्री बटुक भैरव मूल मंत्र का पाठ करें। मूलमंत्र: “ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरू कुरू बटुकाय ह्रीं” अन्य देवताओं की तरह श्री भैरव के अनेक रूपहैं जिसमें प्रमुख रूप से बटुक भैरव, महाकाल भैरव तथा स्वर्णाकर्षण भैरव प्रमुख हैं। जिस भैरव की पूजा करें उसी रूप के नाम का उच्चारण होना चाहिए। सभी भैरवों में बटुक भैरव उपासना का अधिक प्रचलन है। तांत्रिक ग्रंथों में अष्ट भैरव के नामों की प्रसिद्धि है। वे इस प्रकार हैं- १. असितांग भैरव, २. चंड भैरव, ३. रूरू भैरव, ४. क्रोध भैरव, ५. उन्मत्त भैरव, ६. कपाल भैरव, ७. भीषण भैरव ८. संहार भैरव। क्षेत्रपाल,दण्डपाणि के नाम सेभी इन्हें जाना जाता है।

 

भैरव जी में सम्पूर्ण विश्व के भरण-पोषण का सामर्थ्य

ब्रह्माजी के वरदान स्वरूप भैरव जी में सम्पूर्ण विश्व के भरण-पोषण का सामर्थ्य हैँ, अत: इन्हें “भैरव” नाम से जाना जाता है।इनसे काल भी भयभीत रहता है अत: “काल भैरव” के नाम से विख्यात हैं। दुष्टों का दमन करने के कारण इन्हें “आमर्दक”कहा गया है। शिव जी ने भैरव को काशी के कोतवाल पद पर प्रतिष्ठित किया है। जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में शनि, मंगल, राहु आदि पाप ग्रह अशुभ फलदायक हों, नीचगत अथवा शत्रु क्षेत्रीय हों। शनि की साढ़े-साती या ढैय्या से पीडित हों, तो वे व्यक्ति भैरवजयंती अथवा किसी माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रविवार या मंगलवार प्रारम्भ कर बटुक भैरव मूल मंत्र की एक माला (१०८ बार) का जाप प्रतिदिन रूद्राक्ष की माला से ४० दिन तक करें, अवश्य ही शुभ फलों की प्राप्ति होगी।

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