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बीकानेर रियासत काल से जुडी ऐतिहासिक धरोहर ‘चांदमल ढढ्ढा की गणगौर ‘

बीकानेर में गणगौर उत्सव में राजघराने की गणगौर के साथ साथ निजी गणगौर के मेले भी सजते है। इन निजी गणगौरों में प्रमुख है बी

बीकानेर। बीकानेर के गणगौर पूजन महोत्सव मे चांदमल ढढा की गणगौर का विशेष स्थान एवं महत्व है। रियासत काल से अब तक चांदमल ढढा की गणगौर अपने अद्वितीय सुंदरता, कलात्मक आभूषणों एवं गणगौर गीतों मे विशेष स्थान रखती है।बीकानेर मे गणगौर गीतों का गायन कही पर भी चांदमल ढढा की गणगौर के रूप श्रृंगार तथा राजसी ठाठ-बाट का बखान नूंवी हवेली, पौटे गवरजा, खस खस पंखा गीत के माध्यम से होता है।

चांदमल ढढा की गणगौर सुंदरता, आभुषण व गीतों के लिए प्रसिद्ध !
चांदमल ढढा की गणगौर सुंदरता, आभुषण व गीतों के लिए प्रसिद्ध !

ऐतिहासिक धरोहर है ढढों  की गणगौर

लगभग सवा सौ वर्षों से निकल रही चांदमल ढढ्ढा की गणगौर के पीछे भी पुत्र की मनोकामना की चाह प्रमुख रही  है।  कहा जाता है की देशनोक से बीकानेर आकर बसे सेठ उदयमल ढढ्ढा के कोई पुत्र नहीं था। राजपरिवार में अच्छी प्रतिष्ठा के कारण उनको शाही गणगौर देखनें का निमंत्रण मिला। तब उदयमल की पत्नी ने प्रण लिया की पुत्र होने के बाद ही गणगौर दर्शन करूंगी।

एक वर्ष गणगौर की विशवास एवं आस्था के साथ साधना करने से उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जिसका नाम चांदमल रखा गया। तभी से प्रतिवर्ष भाईया के साथ गणगौर निकालने की परम्परा शुरू हुई।  सेठ चांदमल जी के गणगौर का भाईया भी उतना ही कीमती है जितनी की गणगौर। सेठ उदयमल राजा के धर्मभाई थे। इसलिए राजा ने उनकी गणगौर की सवारी नहीं निकाल कर चैत्र शुक्ला तृतीया एवं चतुर्थी को मेला प्रारम्भ करने की इजाजत दी

राजस्थान की पहली पैरों वाली गणगौर

इस गणगौर की सवारी की एक बड़ी विशेषता भी है की इसके पांव है। जबकि बाकि सब गणगौर के पांव नहीं होते। भारी -भारी कपड़ों और आभूषणों से सजी यह गणगौर अद्वितीय लगती है। यह गणगौर ढढ्ढ़ो के पुस्तैनी घर के आगे पाटे पर विराजमान रहती है। इस गणगौर के चारो तरफ सुरक्षाकर्मीयों का पहरा रहता है। मेले के दोनों ही दिन गणगौर के आगे सुबह से शाम तक घूमर नृत्य चलता रहता है।

147 वर्ष से अधिक पुराना है इतिहास 
147 वर्ष से अधिक पुराना है इतिहास

रविन्द्र कुमार ढढा के अनुसार आमजन का विशेष लगाव, श्रद्धा भक्ति मां गवरजा के प्रति है। इसी कारण जन जन के मन व हर कंठ मे चांदमल ढढा की गणगौर समायी हुई है। 147   वर्ष पुराना ऐतिहासिक मेला ढढों के चौक मे प्रतिवर्ष आयोजित हने वाला चांदमल ढढा की गणगौर का मेला 147  वर्ष पुराना है। रविन्द्र कुमार ढढा के अनुसार मेले के प्रति लोगो मे प्रगाढ आस्था व भक्ति भावना है। शहर से गांवों तक के लोग मां गवरजा एवं भाया के दर्शन हेतु ढढों के चौक मे पंहुचते है।चांदमल ढढा परिवार के सदस्य भी देश के विभिन्न स्थानों व विदेशों से मेले के दौरान बीकानेर पंहुचते है व मां गवरजा की पूजा अर्चना कर मनवांछित फल की कामना करते है।

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