अजब गजबबीकानेर

खुबसूरत हवेलियों का शहर है हमारा बीकानेर

हवेलियों का शहर बीकानेर

बीकानेर कोटगेट के अन्दर की तरफ सार्दूल हाई स्कूल के आगे से बाईं ओर नये कुएं से सिटी कोतवाली के समीप से एक व्यस्त पक्की सड़क दर्ज़ियों की छोटी गुवाड़ में जाती है । इस गुवाड़ की मुख्य सड़क की थोड़ी चढ़ाई पर पहुंचते ही दूर से दिखाई देती हैं लाल पत्थर से निर्मित ये हवेलियां।

बीकानेर कोटगेट के अन्दर की तरफ सार्दूल हाई स्कूल के आगे से बाईं ओर नये कुएं से सिटी कोतवाली के समीप से एक व्यस्त पक्की सड़क दर्जियांे की छोटी गुवाड़ में जाती है । इस गुवाड़ की मुख्य सड़क की थोड़ी चढ़ाई पर पहुंचते ही दूर से दिखाई देती हैं लाल पत्थर से निर्मित ये हवेलियां लगभग एक शताब्दी पूर्व निर्मित रामपुरियों की हवेलियां जो अपने आप में समृद्ध कला को समेटे हुए हैं । बीकानेर की इन हवेलियां में मुगल, हिन्दू और यूरोपीय कला का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है ।

 

 

18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध एवं उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में बनी इन रामपुरिया की तीन-चार मंजिली हवेलिया में लाल पत्थर का प्रयोग बहुतायत से किया गया है । सिद्धहस्त बीकानेर के सिलावट व उस्ता कलाकारों की पत्थरों पर विविष सूक्ष्म रूपांकन उत्कीर्ण में कीर्तिमुख, घट पल्लव, लहरपल्लरी, इन तीनों परंपराओं का अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया गया है । बेजोड़ कारीगरी एवं लाल पत्थर की बारीक खुदाई से युक्त रामपुरिया हवेलियां के कारण इसे हवेलियांे का नगर भी कहा जाता है ।

 

बीकानेर की प्रमुख हवेलियों 

 

बच्छावतों की हवेली,रामपुरिया हवेली,कोठारी हवेली, मोहता हवेली

यहां डागों, मोहतों, बच्छावतों एवं श्रीमंतों की भी कुछ हवेलियां हैं । सेठ हीरालाल सौभागमल रामपुरिया की हवेली दर्जियों की छोटी गुवाड़ में है । हवेली में लगे लाल पत्थर बीकानेर के गांव जामसर के समीच स्थित ‘ढुलमेरा’ खान के हैं ।

 

 

सेठ हीरालाल की हवेली के विशाल परिक्षेत्र आधुनिक शैली से निर्मित है जिसकी आंतरिक भाग की सजावट सर्वाधिक आकर्षक है । इस हवेली में प्रवेश करते ही सामने आयताकार आंगन व चारों ओर एक बरामदा है जहां लगभग तीन दर्जन धार्मिक एवं विभिन्न शैलियां के चित्रांकन सुरक्षित हैं । आंगन का फर्श लाल पत्थर से निर्मित है तो दीवारें चाइना टाइल्स से सजी है ।

 

मुख्य द्वार से सटे बरामदे में दाईं तरफ एक गेस्ट हाउस है । इसमंे संगीत संबंधी सामान है और लगभग एक दर्जन बीकानेरी शैली के चित्र लगे है । बर्मा की कुर्सियों, उनकी नक्कासी आकर्षित करती हैं । यहां की छत प्लास्टर आॅफ पेरिस से बहुत आयामी डिजाइन में बनी है । हवेली में ऊपर की तरफ जाने के लिये घुमावदार सीढि़यां हैं जिसकी लोहे की रैलिंग देखने योग्य है ।

 

 

दूसरी एवं तीसरी मंजिल की छत जर्मनी में बनी विभिन्न धातुओं की चद्दर से बनी है । इसी हवेली की तीसरी मंजिल पर एक बड़ा हाॅल संग्रहालय के रूप में सजाया गया है जिसमें कांच से निर्मित मेज, कुर्सियां और एक पलंग, जिसकी छत भी कांच से बनी है ।म्यूजियम हाॅल में कांच, चांदी, हाथ्ज्ञी दांत एवं विभिन्न धातुओं से निर्मित गिलास, कुप्पी, इंजन, तलवारें, बैलगाड़ी, बग्गी, मोटर, पशुपक्षियों के खिलौने और चैपड़ का सामान देखते ही बनता है । यहां जैन धर्म के तीर्थंकरों एवं रावण द्वारा सीता हरण के चित्र भी बहुत आकर्षक हैं ।

 

 

इन हवेलियों में नीचे से ऊपर तक की हुई खुदाई व अलंकरण की अनोखी कारीगरी ने बीकानेर की कलात्मकता को सजीव कर दिया है । यहीं इनके अंदर की तरफ दीवारों पर ‘‘आला-गीला’’ शैली में काम किया हुआ है । ‘आला-गीला एक ऐसी विधा है जो तभी मिट सकती है जब दीवार पर लगा चूना भी उसके साथ-साथ उतरे ।दीवारों पर चूना लगाते समय ही आला-गीला की चित्रकारी की जाती है । आला-गीला के अतिरिक्त इन हवेलियों में किशनगढ़, बीकानेर एवं मुगल आदि शैलियों के चित्रांकन भी देखे जा सकते हैं । अपनी कला के कारण रामपुरियों की हवेलियां शिल्प की अद्भुत धरोहर बन गई हैं ।

Tags
Show More

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Close

Adblock Detected

Please consider supporting us by disabling your ad blocker