अजब गजबबीकानेर

‘ कलयुग के भागीरथ ‘ थे महाराजा गंगा सिंह!

​आज हम आपको जिनके बारे में बता रहे है वो बीकानेर संभाग के राजाओं में सबसे लोकप्रिय राजा महाराजा गंगासिंह बहादुर थे। गंगा सिंह जी ने राजा लालसिंह के घर तीसरी संतान के रूप जन्म लिया था। जिनके बड़े भाई डूँगरसिंह जी थे।

महाराजा गंगासिंह जी जन्म 3 अक्टुबर 1880 में हुआ था गंगा सिह जी के जन्म के समय ही देश अंग्रेजों सत्ता के आधीन हो चुका था और गुलामी की जंजीरों में कैद था। महाराजा गंगासिंह ने बीकानेर रियासत कार्य भार बड़े भाई डुँगरसिंह जी की मृत्यु उपरांत संभाला था ।

 

प्रारंभिक शिक्षा पहले घर ही में, फिर बाद में अजमेर के मेयो कॉलेज में 1881 से 1894 के बीच हुई। ठाकुर लालसिंह के मार्गदर्शन में 1894 से 1898 के बीच इन्हें प्रशासनिक प्रशिक्षण मिला। 1898 में गंगा सिंह फ़ौजी-प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए देवली रेजिमेंट भेजे गए जो तब ले.कर्नल बैल के अधीन देश की सर्वोत्तम मिलिट्री प्रशिक्षण रेजिमेंट मानी जाती थी।

महाराजा गंगासिंह जी का पहला विवाह प्रतापगढ़ राज्य की बेटी वल्लभ कुंवर से 1897 में, और दूसरा विवाह बीकमकोर की राजकन्या भटियानी जी से हुआ जिनसे इनके दो पुत्रियाँ और चार पुत्र हुए|

पहले विश्वयुद्ध में एक फ़ौजी अफसर के बतौर गंगासिंह ने अंग्रेजों की तरफ से ‘बीकानेर कैमल कार्प्स’ के प्रधान के रूप में फिलिस्तीन, मिश्र और फ़्रांस के युद्धों में सक्रिय हिस्सा लिया। 1902 में ये प्रिंस ऑफ़ वेल्स के और 1910 में किंग जॉर्ज पंचम के ए डी सी भी रहे।

महायुद्ध-समाप्ति के बाद अपनी पुश्तैनी बीकानेर रियासत में लौट कर उन्होंने प्रशासनिक सुधारों और विकास की गंगा बहाने के लिए जो-जो काम किये वे किसी भी लिहाज़ से साधारण नहीं कहे जा सकते है । 

1913 में उन्होंने एक चुनी हुई जन-प्रतिनिधि सभा का गठन किया, 1922 में एक मुख्य न्यायाधीश के अधीन अन्य दो न्यायाधीशों का एक उच्च-न्यायालय स्थापित किया और बीकानेर को न्यायिक-सेवा के क्षेत्र में अपनी ऐसी पहल से देश की पहली रियासत बनाया। 

अपनी सरकार के कर्मचारियों के लिए उन्होंने ‘एंडोमेंट एश्योरेंस स्कीम’ और जीवन-बीमा योजना लागू की, निजी बेंकों की सेवाएं आम नागरिकों को भी मुहैय्या करवाईं, और पूरे राज्य में बाल-विवाह रोकने के लिए शारदा एक्ट कड़ाई से लागू किया! 

सन 1916 में ये ‘सेन्ट्रल रिक्रूटिंग बोर्ड ऑफ़ इण्डिया’ के सदस्य नामांकित हुए और इसी वर्ष उन्होंने ‘इम्पीरियल वार कांफ्रेंस’ में, 1919 में ‘पेरिस शांति सम्मलेन’ में और ‘इम्पीरियल वार केबिनेट’ में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 1920  से 1923 के बीच गंगा सिंह ‘इन्डियन चेंबर ऑफ़ प्रिन्सेज़’ के चांसलर बनाये गए। इस बीच 1924 में ‘लीग ऑफ़ नेशंस’ के पांचवें अधिवेशन में भी इन्होंने भारतीय प्रतिनिधि की हैसियत से हिस्सा लिया।

महाराजा गंगासिंह ने 1899 से 1900 के बीच पड़े कुख्यात ‘छप्पनिया काल’ की ह्रदय-विदारक विभीषिका देखी थी लोगों को अन्न-जल के लिए मोजताज होते देखकर उन्होने अपनी रियासत के लिए पानी का इंतजाम एक स्थाई समाधान के रूप में करने का संकल्प लिया था

और इसीलिये सबसे क्रांतिकारी और दूरदृष्टिवान काम, जो इनके द्वारा अपने राज्य के लिए किया गया वह था पंजाब की सतलज नदी का पानी ‘गंग-केनाल’ के ज़रिये बीकानेर जैसे सूखे प्रदेश तक लाना और नहरी सिंचित-क्षेत्र में किसानों को खेती करने और बसने के लिए मुफ्त ज़मीनें देना महाराज गंगासिंह के इन्ही प्रयासों के चलते लोगों ने उन्हे ‘ कलयुग के भागीरथ ‘ की उपाधि से नवाजा था । 

महाराजा गंगासिंह के अथक प्रयासों से ही गंगानगर जिले की स्थापना की हुई और गंगानगर शहर के विकास को भी उन्होंने प्राथमिकता दी वहां कई निर्माण करवाए । 

बीकानेर में अपने निवास के लिए पिता लालसिंह के नाम से ‘लालगढ़ पैलेस’ का निर्माण किया गया | बीकानेर को जोधपुर शहर से जोड़ते हुए रेलवे के विकास और बिजली लाने की दिशा में भी ये बहुत सक्रिय रहे।

 

जेल और भूमि-सुधारों की दिशा में इन्होंने नए कायदे कानून लागू करवाए, नगरपालिकाओं के स्वायत्त शासन सम्बन्धी चुनावों की प्रक्रिया शुरू की, और राजसी सलाह-मशविरे के लिए एक मंत्रिमंडल का गठन भी किया।

सन 1933 में हिंदू मुस्लिम आस्था के प्रतीक लोकदेवता रामदेवजी की समाधि ( रामदेवरा) पर एक पक्के मंदिर के निर्माण का श्रेय भी महाराजा गंगासिंह जी को मिला है। 

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महाराजा गंगासिंह को सन 1880 से 1943 तक इन्हें 14 से भी ज्यादा कई महत्वपूर्ण सैन्य-सम्मानों के अलावा सन 1900  में ‘केसरेहिंद’ की उपाधि से विभूषित किया गया।  1918 में इन्हें पहली बार 19 तोपों की सलामी दी गयी, वहीं 1921 में दो साल बाद इन्हें अंग्रेज़ी शासन द्वारा स्थाई तौर 19 तोपों की सलामी योग्य शासक माना गया।

फरवरी 1943  को बंबई में 62 साल की उम्र में आधुनिक बीकानेर के निर्माता जनरल गंगासिंह का निधन हुआ।

 

 

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