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दुनियां का आठवां अजूबा है ये चमत्कारी मंदिर , यहाँ रहते है 25,000 चूहे !

 देशनोक करणी माता  (चूहों वाली देवी ) 

 

राजस्थान एक ऐसा राज्य जो जितना खूबसूरत है उतना ही अपने आप में विचित्र भी। कुछ ऐसा ही है इस मरूस्थल में आश्चर्य का विषय लिए बसा देशनोक कस्बा। देशनोक करणी माता के मंदिर की बदौलत पूरे भारत में फेमस है क्योंकि ये मंदिर अपने आप में खास है। इस मंदिर में भक्तों से ज्यादा काले चूहे नजर आते हैं। वैसे यहां चूहों को काबा कहा जाता है और इन काबाओं को बाकायदा दुध, लड्डू आदि भक्तों के द्वारा परोसा भी जाता है।

 

करणी माता, जिन्हे की भक्त माँ जगदम्बा का अवतार मानते है, का जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम रिघुबाई था। रिघुबाई की शादी साठिका गांव के किपोजी चारण से हुई थी लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उनका मन सांसारिक जीवन से ऊब गया इसलिए उन्होंने किपोजी चारण की शादी अपनी छोटी बहन गुलाब से करवाकर खुद को माता की भक्ति और लोगों की सेवा में लगा दिया। जनकल्याण, अलौकिक कार्य और चमत्कारिक शक्तियों के कारण रिघु बाई को करणी माता के नाम से स्थानीय लोग पूजने लगे।

 

” लोग इस मंदिर में आते तो ‘करणी माता के दर्शन के लिए हैं पर साथ ही नजरें खोजती हैं सफेद चूहे को…आइए बताते हैं क्यों! ?? 

यह है राजस्थान के ऐतिहासिक नगर बीकानेर से लगभग 30 किलो मीटर दूर देशनोक में स्थित करणी माता का मंदिर जिसे ‘चूहों वाली माता’, ‘चूहों वाला मंदिर’ और ‘मूषक मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है। वैसे तो चूहों को प्लेग जैसी कई भयानक बीमारियों का कारण माना जाता है। लेकिन हमारे देश भारत में माता करणी माता का मंदिर एक ऐसा मंदिर है जहां पर 25,000 चूहे रहते हैं  यहां पर चूहों को काबा कहा जाता है।ये चूहे करणीमाता के ‘काबा’ कहलाते हैं।  मंदिर में इतने सारे चूहें कि इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मंदिर में आप पैर को ऊपर उठाकर नहीं चल सकते, बल्कि आपको पैर घसीटकर चलना होता है। वो इसीलिए कि पैर उठाकर चलने से कोई काबा पैर के नीचे ना आएं, इसे अशुभ माना जाता है।

 इनको मारना या पकड़ना सर्वथा वर्जित है। अनजाने में भी यदि किसी श्रद्धालु के पाँव से कोई चूहा मर जाये तो उसके प्रायश्चित स्वरूप मंदिर में सोने का चूहा भेंट स्वरूप चढ़ाना पड़ता है। करणीमाता के मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता यह है की निज मंदिर सहित समूचे मंदिर प्रांगण में हजारों की संख्या में चूहे निर्भय होकर स्वच्छंद होकर विचरण करते हैं।  कहते हैं कि एक बार करणी माता की संतान उनके पति और उनकी बहन का पुत्र लक्ष्मण कपिल सरोवर में डूब कर मर गया। जब मां को यह बात पता चली तो उन्होंने मृत्यु के देवता यम से लक्ष्मण को जीवित करने की काफी प्रार्थना की, जिसके बाद यमराज ने विवश होकर उसे चूहे के रूप में पुनर्जीवित किया।

इन मंदिरो के चूहों की एक विशेषता और है की मंदिर में सुबह 5 बजे होने वाली मंगला आरती और शाम को 7 बजे होने वाली संध्या आरती के वक्त अधिकांश चूहे अपने बिलो से बाहर आ जाते है। इन दो वक्त चूहों की सबसे ज्यादा धामा चौकड़ी होती है। यहां पर रहने वाले चूहों को काबा कहा जाता है।मंदिर में चूहों को दूध पिलाने के लिए कड़ाव रखे हैं। उनको मिठाई खिलाने व दूध पिलाने के लिए नियमित बजट का प्रावधान है। मां को चढ़ाये जाने वाले प्रसाद को पहले चूहे खाते है फिर उसे बाटा जाता है। चील, गिद्ध और दूसरे जानवरो से इन चूहों की रक्षा के लिए मंदिर में खुले स्थानों पर बारीक जाली लगी हुई है।

वर्तमान में जहां यह मंदिर स्थित है वहां पर एक गुफा में करणी माता अपनी इष्ट देवी की पूजा किया करती थी। यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में स्थित है। कहते हैं करनी माता 151 वर्ष जिन्दा रहकर 23 मार्च 1538 को ज्योतिर्लिन हुई थी। उनके ज्योतिर्लि होने के पश्चात भक्तों ने उनकी मूर्ति की स्थापना करके उनकी पूजा शुरू कर दी जो की तब से अब तक निरंतर जारी है। करणी माता बीकानेर राजघराने की कुलदेवी है। कहते है की उनके ही आशीर्वाद से बीकानेर और जोधपुर रियासत की स्थापना हुई थी। करणी माता के वर्तमान मंदिर का निर्माण बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह ने बीसवीं शताब्दी के शुरुआत में करवाया था।

करणीमाता का मंदिर अपने शिल्प और स्थापत्य के कारन भी दर्शनीय है। लगभग पांच सौ वर्ष पुराने इस मंदिर का निर्माण अनेक राजाओं के शासनकाल में तथा विभिन्न चरणों में हुआ है। सर्वप्रथम करणीजी नेहड़ीजी नामक स्थान पर रही तदुपरान्त वर्तमान मंदिर के स्थान पर। इस इस स्थान पर उन्होंने अपने हाथों से विशाल प्रस्तर खण्डों को एक के ऊपर एक रखकर बिना चूने गारे के एक गोलाकार गुम्बारे का निर्माण वि.संवत 1594 में कराया।  इस गुम्बारे के बीचोंबीच करणीजी की पीले पत्थर पर कोरनी की गयी भव्य और आकर्षक मूर्ति स्थापित है, जो लोकमान्यता के अनुसार जैसलमेर के एक अंधे कारीगर द्वारा बनाई गई थी।

 

 

करणीमाता को लापसी का नियमित भोग लगता है। नवरात्र तथा अन्य विशेष अवसरों पर विशाल पैमाने पर भोग व प्रसादी का आयोजन होता है। सफ़ेद चूहे व चील का दिखाई देना बहुत शुभ माना जाता है।  करणीमाता के मंदिर की अपनी निराली शान और पहचान है। देश-विदेश से असंख्य श्रद्धालु देवी के दर्शन कर इच्छित फलप्राप्ति हेतु यहाँ आते हैं।

 

संकलन
बीकानेर प्राइड

 

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